“तुम क्यों रौशनी से घबराए लगते हो,

“तुम क्यों रौशनी से घबराए लगते हो,
किसी रात अँधेरे के सताए लगते हो..

मिट्टी को हाथों में पोत लिया है,
गांव बरसों बाद आये लगते हो..

अपनी कमज़ोरी कौन किसे बताए,
पास बैठो तुम चोट खाये लगते हो..

कैसे करें कोशिश तुम्हे भूल जाने की,
हर एक चेहरे में तुम समाये लगते हो..

दूर होते हो तो सांसे दिक्कत करती हैं..
जब तुम पास होते हो पराए लगते हो ।

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