“कुछ रिवायतों का मुझपे असर न हो सका,

“कुछ रिवायतों का मुझपे असर न हो सका,
जिस ओर सब खड़े थे मैं उधर न हो सका..

सुबह की ओस और शाम की महक तो हो गया,
मेरे साथ वो कभी जलती दोपहर न हो सका..

दिवार से लिपट के रोया इक शाम ज़ार ज़ार,
वो कमरा मेरा था वो मेरा घर न हो सका..

इक उम्मीद, वो किताब और एक धुंधला चेहरा,
ले के चला मैं राह पे पर सफर न हो सका..

एक कदम की दूरी बस ज़्यादा कुछ नहीं..
ये फासला तय हमसे उम्र भर न हो सका ।

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