“परेशान नहीं हूँ मैं,
बस एक भीड़ का हिस्सा बन के अच्छा नहीं लगता,
जहाँ सब क़समें खाते है पर कुछ सच्चा नहीं लगता..
मुस्कुराते है जो चेहरे नज़रो से नज़रें मिला कर,
फिर उन्हीं को बुरा कहते है दूसरे चेहरे पे जा कर..
मुझमें कुछ अलग है सब सोच के निकलते है,
हालांकि एक ही रास्ते पे कई सालों से चलते है।
जहाँ सब क़समें खाते है पर कुछ सच्चा नहीं लगता..
मुस्कुराते है जो चेहरे नज़रो से नज़रें मिला कर,
फिर उन्हीं को बुरा कहते है दूसरे चेहरे पे जा कर..
मुझमें कुछ अलग है सब सोच के निकलते है,
हालांकि एक ही रास्ते पे कई सालों से चलते है।
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