“इस कांच को जिसने तोड़ा वो पत्थर संभाल रखा है,
इस कांच को जिसने तोड़ा वो पत्थर संभाल रखा है,
मैंने इस अँधेरे में कुछ जुगनुओं को पाल रखा है..
आज फिर से मन हुआ है तुझे भूल जाने का,
कई दिनों से ये ख्याल मैंने कल पे टाल रखा है..
याद नहीं क्या लेन देन हुआ अपने दरमियाँ,
एक सूखा सा ग़ुलाब है जो मैंने संभाल रखा है..
अब वो आएंगे या नहीं ये खबर भी नहीं मिलती,
आखिरी वक़्त में भी मैंने ये क्या सवाल रखा है
मैंने इस अँधेरे में कुछ जुगनुओं को पाल रखा है..
आज फिर से मन हुआ है तुझे भूल जाने का,
कई दिनों से ये ख्याल मैंने कल पे टाल रखा है..
याद नहीं क्या लेन देन हुआ अपने दरमियाँ,
एक सूखा सा ग़ुलाब है जो मैंने संभाल रखा है..
अब वो आएंगे या नहीं ये खबर भी नहीं मिलती,
आखिरी वक़्त में भी मैंने ये क्या सवाल रखा है
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