“होती क्या है इश्क़ फ़कीरी कोई हमें बतलाये क्यों,

“होती क्या है इश्क़ फ़कीरी कोई हमें बतलाये क्यों,
अब तो कोई दुआ भी न की फिर वो सामने आये क्यों..

तेरे पास से जो गुज़रते शायद तुझे बुला भी लेते,
हवा से होती बैर है दिन में रात को दिए जलाये क्यों..

निगाहें किसी ओर चली और मन कहता कुछ और,
उनका दिल कही और है तो उनसे दिल लगाये क्यों..

क्यों हिसाब नहीं है कोई इश्क़ के गली मोहल्ले में,
हम उनसे अगर खफ़ा है तो हम ही उन्हें मनाये क्यों ।

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