“घर से निकला है आज नक़्शे के बिना कोई,
“घर से निकला है आज नक़्शे के बिना कोई,
उम्मीद करते है कि दे रास्ता दिखा कोई
जैसे कहानियों में मिल कर रोते हैं लोग,
कभी इस तरह से ना हमसे मिला कोई
नींद आती है और ख़्वाब में सब दिखते हैं,
आँखें खुली तो ना फिर पास में दिखा कोई
ख़त में तेरे उस आख़िरी जवाब के बाद,
एक शेर भी हमने ढंग का ना लिखा कोई
दोहराया एक ही फ़साने को कई दफ़ा मैंने,
ना मिल पाया मुझे इसमें तेरे सिवा कोई
उम्मीद करते है कि दे रास्ता दिखा कोई
जैसे कहानियों में मिल कर रोते हैं लोग,
कभी इस तरह से ना हमसे मिला कोई
नींद आती है और ख़्वाब में सब दिखते हैं,
आँखें खुली तो ना फिर पास में दिखा कोई
ख़त में तेरे उस आख़िरी जवाब के बाद,
एक शेर भी हमने ढंग का ना लिखा कोई
दोहराया एक ही फ़साने को कई दफ़ा मैंने,
ना मिल पाया मुझे इसमें तेरे सिवा कोई
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